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विवेकानन्दपुरम में रामायण दर्शनम् व भारतमाता सदनम् के लोकार्पण समारोह - प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के भाषण

विवेकानन्दपुरम में रामायण दर्शनम् व भारतमाता सदनम् के लोकार्पण समारोह - प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के भाषणMost respected Morari Bapu Ji, President of the Vivekananda Kendra Shri P Parmeshvaran Ji, My ministerial colleague Pon Radhakrishnan Ji , Swami Ji of the Vivekananda Ashram Chaitanyanand Ji, Balakrishna Ji, Bhanudas Ji, Vice President of the Vivekananda Kendra Nivedita Ji and my dear friends!

I would have loved to be in your midst but thanks to the power of technology, we are connected on this occasion. And, in any case, I am no guest but am a part of this family. I am one of your own.

12th January- this is no ordinary day. This is a day etched in history as a day when India was blessed with one of the greatest thinkers, a guiding light and a stalwart who took India’s message to the entire world.

I offer my tributes to the revered Swami Vivekananda. He was a giant, whose powerful thoughts continue to shape several minds.

आज विवेकानन्दपुरम में रामायण दर्शनम, भारत माता सदनम का लोकार्पण हो रहा है। हनुमानजी की 27 फीट ऊंची प्रतिमा की और वो भी एक ही पत्थर की बनी हुई स्थापित की जा रही है। आप लोगों ने इससे संबंधित जो वीडियो मुझे भेजा था, वो मैंने देखा है और इस वीडियो को देख कर मैं कह सकता हूं इसमें दिव्यता भी है-भव्यता भी है।

आज ही विवेकानन्द केंद्र के संस्थापक स्वर्गीय एकनाथ रानडे जी की प्रतिमा (portrait) का भी अनावरण हो रहा है। आप सभी को आज के इस आयोजन के लिए हृदय से बहुत बहुत बधाई देता हूं।

भाइयों और बहनों, आज आप लोग जिस स्थान पर हैं वह सामान्य स्थान नहीं है। यो भूमि इस राष्ट्र की तपोभूमि की तरह है। अगर हनुमान जी को अपना जीवन ध्येय (purpose of life) मिला तो इसी धरती पर मिला। जब उन्हें जांबवंत ने उनसे कहा था कि तुम्हारा तो जन्म ही भगवान श्री राम के कार्य के लिए हुआ है। इसी धरती पर मां पार्वती की कन्याकुमारी का उसको purpose of life मिला। यही वो धरती है जहां महान समाज सुधारक, संत तिरूवल्लूवर को दो हजार वर्ष पूर्व ज्ञान का अमृत मिला। यही वो धरती है जहां स्वामी विवेकानन्द को भी जीवन का उद्देश्य प्राप्त हुआ। यहीं पर तप करने के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्ति के लिए मार्ग दर्शन मिला था। यही वो जगह है जहां एकनाथ रानडे जी को भी अपने जीवन का, जीवन की जो यात्रा थी उसमें एक नया मोड़ मिला। एक नया लक्ष्य प्रस्थापित हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन “एक जीवन एक ध्येय” (one life one mission) के रूप में इसी कार्य के लिये आहुत कर दिया। इस पवित्र भूमि को इस तपो भूमि को मेरा शत शत वंदन है, मेरा नमन है।

साल 2014 में जब हम एकनाथ रानडे जी के जन्म शताब्दी मना रहे थे, तब मैंने कहा था- कि ये अवसर युवाओं के मन को जगाने का है। हमारा भारत युवा है- वो दिव्य भी बने और भव्य भी बने। आज दुनिया भारत से दिव्यता की अनुभूति की अपेक्षा कर रही है और भारत का गरीब, दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित ये भारत की भव्यता की अपेक्षा करता है। और विश्व के लिये दिव्यता तो देश के अंदर के लिये भव्यता और इन दोनों का मेल करके ही राष्ट्र निर्माण की दिशा में हमें आगे बढ़ना है।

भाइयों बहनों, आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश ( young country) है। युवा देश है। 80 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु (age) की है। स्वामी विवेकानन्द आज हमारे बीच नहीं हैं, साक्षात रूप में नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों में इतनी शक्ति (power) है, इतनी ताकत है, इतनी प्रेरणा है कि देश के युवाओं (youth) को संगठित करके राष्ट्र निर्माण (nation building) का रास्ता दिखा रही है।

एकनाथ रानडे जी ने युवाओं की इस शक्ति को एकजुट करने के लिए, विवेकानन्द केंद्र और विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की स्थापना की थी। एकनाथ रानडे जी कहते थे कि हमें स्वामी विवेकानन्द अच्छे लगते हैं सिर्फ इतने भर से कुछ नहीं होगा। देश के लिए स्वामी विवेकानन्द ने जो कल्पना की है, उसे साकार करने के लिए वो सतत योगदान को भी महत्वपूर्ण (important) मानते थे।

एकनाथजी ने जिस एक लक्ष्य के लिए पूरा जीवन लगा दिया था, वो था- स्वामी विवेकानन्द जी जैसे युवकों का निर्माण। उन्होंने युवाओं में राष्ट्रनिर्माण के वही आदर्श स्थापित करने का हमेशा प्रयास किया, जो नीतिमत्ता (ethics) जो मूल्य (Values) स्वामी विवेकानन्द जी के थे। मेरा ये बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि जीवन के अनेक वर्षों तक मुझे एकनाथ जी निकट के साथी के रूप में काम करने का अवसर मिला। इसी धरती पर कई बार आकर के उनके सानिध्य में जीवन को निखारने का मुझे अवसर मिलता था। 

एकनाथ जी के जन्मशती पर्व के दौरान ही तय हुआ था कि हमारे संस्कृति (culture) और हमारे विचार प्रवाह (thought process) पर रामायण के प्रभाव को दर्शाती एक प्रदर्शनी शुरू की जाए। आज रामायण दर्शनम भव्य रूप में हम सभी के सामने है। और मुझे विश्वास है देश और दुनिया के जो यात्री रॉक मेमोरियल पर आते हैं। ये रामायण दर्शनम शायद उनको ज्यादा प्रेरित भी करेगा। प्रभावित भी करेगा। श्रीराम भारत के कण कण में हैं। जन जन के मन में हैं। और इसलिये जब हम श्रीराम के विषय में सोचते हैं, तो श्रीराम एक आदर्श पुत्र-भाई-पति,मित्र और आदर्श राजा थे। अयोध्या भी एक आदर्श नगर था तो रामराज्य एक आदर्श शासन व्यवस्था थी। इसलिए भगवान राम और उनके राज्य का आकर्षण समय-समय पर देश की महान शख्सियतों को अपने तरीके से रामायण की व्याख्या करने के लिए प्रेरित करता रहता है। इन व्याख्याओं की झलक अब रामायण दर्शनम में मिलेगी।

महाकवि कम्बन ने कंब रामायणम में कौशल राज्य को एक सुशासित राज्य बताया है। उन्होंने तमिल में जो लिखा, मैं उसका अंग्रेजी में अनुवाद अगर करूं तो उन्होंने लिखा था-

None were generous in that land as None was needy;

None seemed brave as none defied;

Truth was unnoticed as there were no liars;

No learning stood out as all were learned.

Since no one in that City ever stopped learning

None was ignorant and none fully learned;

Since all alike had all the wealth

None was poor and none was rich.

ये कम्बन द्वारा रामराज्य का दर्शन (presentation) है। महात्मा गांधी भी इन्हीं विशेषताओं की वजह से रामराज्य की बात करते थे। निश्चित तौर पर ये एक ऐसा शासन था, जहां व्यक्ति महत्वपूर्ण (Person important) नहीं होता, बल्कि सिद्धांत महत्वपूर्ण (Principle important) हुआ करते थे।

गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में रामराज्य का विस्तार से वर्णन किया है। रामराज्य यानी जहां कोई गरीब न हो, दु:खी ना हो, कोई किसी से घृणा ना करता हो, जहां सभी स्वस्थ और सुशिक्षित हों। जहां प्रकृति और मनुष्य के बीच तालमेल हो। उन्होंने लिखा है-

दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि व्यापा।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा,  सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना,  नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।

राम रावण को हरा कर बड़े नहीं बने। बल्कि राम तब राम बने जब उन्होंने उन लोगों को साथ लिया जो सर्वहारा थे। साधनहीन थे। उन्होंने उन लोगों को आत्म गौरव बहाल किया और उनमें विजय का विश्वास पैदा किया। भगवान राम के जीवन में उस भूमिका को स्वीकार नहीं किया जो उनके वंश द्वारा जो परम्पराएं थीं। एक एक वरों में कई बातें हमलोग जानते हैं। वो अयोध्या से बाहर निकले थे। अभी नगर की सरहद से भी बाहर नहीं निकले लेकिन पूरे विश्व को पूरी मानवता को अपने आप में समाहित करते हुए आदर्श क्या होता है, मूल्य क्या होते हैं, मूल्यों के प्रति जीवन का समर्पण क्या होता है, उसे उन्होंने जीकर के दिखाया था। और इसलिये मैं समझता हूं कि ये रामायण दर्शनम ये अपने आप में विवेकानन्दपुरम में एक प्रासंगिक और हम जानते हैं प्रगति के लिये समाज जितना सबल चाहिए, राज्य भी सुराज्य होना चाहिए।

जब रामजी को देखते हैं तो व्यक्ति का विकास, व्यवस्था का विकास ये बातें सहज रूप से नजर आती हैं।

भाइयों बहनों, एकनाथजी भी हमेशा चाहते थे कि देश की आध्यात्मिक शक्ति (spiritual power) को जगाकर देश की कर्मशक्ति या कार्यशक्ति (working power) को विधायक (constructive) कार्यों में लगाया जाए। आज जब विवेकानन्द केंद्र में हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना हो रही है, तो उनके इस कथन की प्रेरणा (inspiration) का भी पता चलता है।

हनुमानजी यानी सेवा, हनुमान जी यानी समर्पण, भक्ति का वो रूप था। जिसमें सेवा ही परम धर्म बन गया था। जब वो समुद्र को पार कर रहे थे तो मैनाक पर्वत उन्हें बीच में विश्राम देना चाहता था। लेकिन संकल्प सिद्धि से पहले हनुमान जी के लिए शिथिलता की कोई गुंजाइश नहीं थी। अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक उन्होंने आराम नहीं किया।

हनुमानजी के सेवाभाव पर भारत रत्न सी राजगोपालाचारी जी ने भी अपनी रामायण में लिखा है। जब हनुमानजी सीता माता से मिलकर वापस लौटते हैं, भगवान राम जी को माता के सकुशल होने की बात बताते हैं, तो राम जी कहते हैं-

"The deed done by Hanumaan none else in the world could even conceive of attempting-crossing the sea, entering Lanka protected by Raavana and his formidable hosts and accomplishing the task set to him by his king, not only fully but beyond the fondest hopes of all."

राजाजी  कहा है कि हनुमान जी ने वो काम किया था, जिसकी कोई उम्मीद तक नहीं कर रहा था। कठिनाइयों के जिस समंदर को हनुमान जी ने पार किया था, वो कोई सोच भी नहीं सकता था।

और इसलिये भाइयों बहनों, हम भी जब ‘सबका साथ, सबका विकास’ ये मार्गदर्शक तत्व (Guiding Principal) पर चल रहे हैं। चाहे गरीब से गरीब व्यक्ति के लिये जनधन योजना के जरिये गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था के साथ जोड़ा जाए आज गरीब के पास एक व्यवस्था कर के हमने आगे बढ़ने का प्रयास किया था। और इसलिये बीमा कराने का विकल्प है। किसानों को इसका लाभ मिला है। किसानों को सबसे कम प्रीमियम पर फसल बीमा योजना दी गई है। बेटियों को बचाने के लिए, उन्हें पढ़ाने के लिये अभियान चला रहे 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ'। गर्भवती महिलाओं को आर्थिक मदद के लिये देशव्यापी योजना बनाई गई है। 5 करोड़ परिवार जो लकड़ी का चूल्हा जलाकर माताएं खाना पकाती थीं और एक दिन में चार सौ सिगरेट का धुंआ खाना पकाने से लड़की के चूल्हे से उस मां के शरीर में जाता था, उन माताओं को अच्छा स्वास्थ्य मिले, प्राथमिक सुविधा मिले, इसीलिए 5 करोड़ परिवारों में गैस कनेक्शन (gas connection) का बीड़ा उठाया और डेढ़ करोड़ दे चुके हैं।

दलित, पीड़ित, वंचित की सेवा यही तो जन सेवा प्रभु सेवा का मंत्र देती है। हमारे देश के दलित नौजवानों को stand-up India, start-up India के जरिए सशक्त (empower) किया जा रहा है। छोटे कारोबारियों को कम ब्याज पर कर्ज मिल सके, इसलिए मुद्रा योजना चलाई गई है। गरीब की गरीबी तभी दूर होगी जब उसे सशक्त (empower) किया जाए। जब गरीब सशक्त होगा, तो स्वयं गरीबी को परास्त करके रहेगा। और गरीबी से मुक्ति का वो आनन्द लेगा और एक नई ताकत के साथ वो आगे बढ़ेगा।

रामायण में जब भगवान राम और भरत के बीच शासन को लेकर संवाद हो रहा था तब भगवान राम ने भरत से कहा था -

कच्चिद् अर्थम् विनिश्चित्य लघु मूलम् महा उदयम्।

क्षिप्रम् आरभसे कर्तुम् न दीर्घयसि राघव।।

यानी, हे भरत, ऐसी योजनाएं लागू करो जिनसे कम से कम व्यय में ज्यादा से ज्यादा लोगों का फायदा हो। रामजी ने भरत से ये भी कहा कि इन योजनाओं को लागू करने में बिल्कुल भी देरी न की जाए।

आयः ते विपुलः कच्चित् कच्चिद् अल्पतरो व्यय:।

अपात्रेषु न ते कच्चित् कोशो गच्छति राघव।।

यानी भरत, इस बात का ध्यान रखना की आय ज्यादा हो और खर्च कम। वो इस बात की भी हिदायत देते हैं कि अपात्रों या undeserving को राज्य कोष का फायदा न मिले।

अपात्रों से सरकारी खजाने को बचाना भी सरकार की कार्यसंस्कृति का हिस्सा है। आपने देखा होगा हमने आधार कार्ड से लिंक करके बैंक अकाउंट में सीधे आर्थिक सहायता ट्रांसफर करना, फर्जी राशनकार्ड वालों को हटाना, फर्जी गैस कनेक्शन वालों को हटाना, फर्जी टीचरों को हटाना, दूसरों का अधिकार छीनने वालों को हटाना, ये सब इस सरकार ने मिशन मोड में लिया है।

भाइयों बहनों, आज ही भारतमाता सदन में पंचलौह से बनी मां भारती की प्रतिमा का अनावरण भी हो रहा है। मां भारती के इस प्रतीक का लोकार्पण सौभाग्य की बात है। जो भी व्यक्तिगण इस विशेष यज्ञ में जुटे थे, उन सभी का मैं इस पुण्य कार्य के लिए अभिवादन करता हूं।

साथियों, मैं विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के समीप बनी संत तिरूवल्लूवर की प्रतिमा को भी प्रणाम कर रहा हूं। तिरूवल्लूवर जी जो सूत्रवाक्य, जो मंत्र दे गए थे, वो आज भी उतने ही सटीक हैं, relevant हैं। नौजवानों के लिए उनकी सीख थी-

“In sandy soil, when deep you delve, you reach the springs below; The more you learn, the freer streams of wisdom flow.”

यानि रेतीली धरती में जितना गहरा आप खोदते जाएंगे, एक दिन पानी तक जरूर पहुंचेंगे। ठीक वैसे ही जैसे आप जितना ज्यादा सीखते जाएंगे एक दिन ज्ञान की, बुद्धिमत्ता की गंगा तक अवश्य पहुंचेंगे।

आज युवा दिवस पर मेरा देश के नौजवानों से आह्वान है- सीखने की इस प्रक्रिया को, सीखने (learning) की प्रक्रिया (process) को कभी मत रुकने दीजिए। अपने भीतर के इस विद्यार्थी को कभी मरने मत दीजिए। जितना आप सीखेंगे, जितनी आप अपनी आध्यात्मिक शक्ति (spiritual power) को विकसित (develop) करेंगे, जितना आप अपनी कौशल (skills) को विकसित (develop) करेंगे, उतना ही आप का भी विकास होगा और देश का भी।

कुछ लोग आध्यात्मिक शक्ति (spiritual power) की जब बात आती है तो उसको समझ नहीं पाते हैं उसको पंथ के दायरे में देखते हैं। लेकिन spiritual power ये पंथ से परा है, बंधनों से परा है। इसका सीधा संबंध मानवीय मूल्यों से है। दैविक शक्ति से है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति और इसी धरती के सपूत डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम कहा करते थे-

“Spirituality to me is the way we relate to God and the Divine. Staying connected with our spiritual life keep us grounded and always be reminded of the value of life and important values such as honesty, loving our neighbours, and many other important traits that will make the workplace a positive environment”.

मुझे खुशी है कि पिछले कई दशकों से विवेकानन्द केंद्र इसी दिशा में प्रयास भी कर रहा है। आज विवेकानन्द केंद्र की दो सौ से ज्यादा ब्रांच हैं। देशभर में 800 से ज्यादा जगहों पर केंद्र के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण भारत और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगातार काम कर रहा है।

पटना से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक, कार्बी आंग्लांग से लेकर कश्मीर के अनंतनाग तक, रामेश्वरम से लेकर राजकोट तक उसकी उपस्थिति है। दूर-दराज वाले इलाको में लगभग 28 हजार छात्रों को इस केंद्र के जरिए शिक्षा दी जा रही है।

मैं विशेष तौर पर उत्तर पूर्व के राज्यों में विवेकानन्द केंद्र के कार्यों की सराहना करना चाहूंगा। एकनाथ जी के रहते ही अरुणाचल प्रदेश में 7 रिहाइशी स्कूल खुले थे। आज उत्तर पूर्व में 50 से ज्यादा जगहों पर विवेकानन्द केंद्र सामाजिक कार्यों से जुड़ा है।

अनगिनत छात्र, आईआईटी स्टूडेंट, डॉक्टर और कई प्रोफेशनल्स स्वेच्छा से विवेकानन्द केंद्रों में सेवाव्रती के तौर पर काम करते हैं। इसके लिए उन्हें किसी प्रकार की सैलरी नहीं दी जाती, बल्कि यह सब सेवा भाव से किया जाता है। मैं मानता हूँ कि निःस्वार्थ भाव से समाज की सेवा के लिए ये सेवाव्रती हम सभी के लिए प्रेरणा हैं। सामान्य जीवन को जीते हुए समाज सेवा का आदर्श उदाहरण है। देश के युवाओं के लिए एक दिशा है, एक मार्ग है।

विवेकानन्द केंद्र से जुड़े लोग आज राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि ये केंद्र आने वाली पीढ़ियों में इसी तरह नए विवेकानन्द का निर्माण करता रहेगा।

आज हर वो व्यक्ति जो राष्ट्र निर्माण में pro-active होकर अपनी duty निभा रहा है, वो विवेकानन्द है। हर वो व्यक्ति जो दलित-पीड़ित-शोषित और वंचितों के विकास (development) के लिए काम कर रहा है, वो विवेकानन्द है। हर वो व्यक्ति जो अपनी ऊर्जा (energy) को, अपने उपाय (ideas), अपने आविष्कार (innovation) को समाज के हित में लगा रहा है, वो विवेकानन्द है।

आप सभी जिस मिशन में जुटे हैं, वो मानवता के लिए, हमारे समाज के लिए, हमारे देश के लिए एक बड़ी तपस्या की तरह है। आप ऐसे ही भाव से देश की सेवा करते रहें, यही कामना है।

विवेकानन्द जी के जन्मदिवस पर, युवा दिवस पर आप सभी को एक बार फिर बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बापू को मेरा जय श्रीराम, और वहां परमेश्वरम जी वगैरह सब को नमन करते हुए मैं मेरी वाणी को विराम देता हूं। और मुझे विश्वास है जैसा मुझे निमंत्रण दिया गया कन्याकुमारी आने के लिये। मेरा अपना घर है ये। देखता हूं कब मौका मिलता है| दौड़ता रहता हूं। दौड़ते – दौड़ते कभी एकाद बार बीच में मौका मिल जाएगा। मैं जरूर वहां उस धरती को नमन करने के लिये आ जाऊंगा। आपके बीच कुछ समय बिताऊंगा। मुझे इस अवसर पर मैं वहां रुबरू नहीं आ सका इसका खेद है लेकिन फिर भी दूर से सही। यहां दिल्ली में ठंड है वहां गर्मी है। इन दो के बीच हम नई ऊर्जा और उमंग के साथ आगे बढ़ेंगे। इसी विश्वास के साथ आप सब को इस पावन पर्व पर बहुत बहुत शुभकामनाएं। बहुत बहुत धन्यवाद।